जन्म मरण और चेतना का नियम By Vinay Singh

Vinay Singh
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 चेतना का नियम...By Vinay Singh 



चेतना किसे कहते हैं ?

चेतना किसी शरीर के अंदर एक प्रकार कि समझ - बुझ कि शक्ति होती है। चेतना यानी "मैं" "मेरे पन" का बोध हो जाना, कि ये "मैं" हूं। चेतना के बारे में और जानने से पहले हम ये जान लेते हैं कि चेतना से होता क्या है, चेतना यानि जागना होता है। उदाहरण के तौर पे मान लिजिए कोई भी निर्जिव चिज़ अगर वो जिंदा हो जाये तो उसे हम चेतना का जागना कहते हैं।

इसे अगर जन्म-मृत्यु से जोड़ कर देंखे तो हम पायेंगे कि किसी शरीर से चेतना का चले जाना ही मृत्यु कहलाती है और दुसरे शरीर में वही चेतना का आ जाना नया जन्म कहलाती है। 

चेतना के पिछे जो शक्ति कार्य कर रही है उसे ही हम आत्मा यानि ईश्वर का अंश मान सकते हैं जिसे देखा नहीं जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है। 

ये बात सही है क्योंकि सच्चे ईश्वर को हम देख नहीं सकते सिर्फ महसूस कर सकते हैं क्योंकि वो कण-कण में व्याप्त हैं। इसलिए भी हम मान सकते हैं कि उस अदृश्य ईश्वर कि शक्ति से ही आत्मा में चेतना आ जाती है और कोई भी वस्तु चाहे वो निर्जिव ही क्यों न हो, उसमें समझ-बुझ कि शक्ति आ जाती है। जिसे हम जीव आत्मा कहते हैं।

अब बात करते हैं कर्म और संस्कार कि -

जैसे कि किसी जीव आत्मा कि मृत्यु हो जाती है और मरते वक्त जो कुछ भी वो संस्कार अपनाये रखता है वहीं संस्कार नये जन्म में भी उसके चेतना के साथ आ जाती है। जिस कारण से उसके नये जीवन का भी निर्धारण होता है और उसे उसी प्रकार का शरीर प्राप्त होता है। उसके आगे भाग्य भी इसी तरह निर्धारित होती है।

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