विनय सिंह द्वारा कहे अनमोल विचार।
हर सुबह इस यकिन के साथ उठो, कि मेरा आज का दिन मेरे कल से बेहतर होगा।
ज्ञान का अर्थ है दुख को कम करना या मुक्ति पाना।
समझ और ज्ञान एक दुसरे के पुरक है।
जिसके पास धन और बल है उसके पास ज्ञान नहीं और जिसके पास ज्ञान है उसके पास धन और बल नहीं। ये सब एक दुसरे के पुरक हैं।
किसी को अपने आप को श्रेष्ट नहीं समझना चाहिए। सबसे बड़ा तो बिल्कुल नहीं।
व्यक्ति का मोह ही सब दुखों का कारण है।
महात्मा बुद्ध के अनुसार
ज्ञान कहीं से भी मिले उसका आदर करना चाहिए और ज्ञान को स्वीकारना चाहिए।
अलग - अलग व्यक्ति के लिए ज्ञान कि समझ अलग हो सकती है। ~ महात्मा बुद्ध के अनुसार
किसी चिज़ का मोह उसे जकड़ लेता है और वह अपने असली लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।
हर ज्ञान को समझने कि हर इंसान कि अपनी समझ होती है और वह उसके अनुसार उसका प्रसार करता है।
अपने मन पे विजय पाने के लिए खुद पे विजय पाना जरुरी है। जो प्राणायाम और ध्यान से ही संभव है।
किसी ज्ञान को अगर हम अच्छे से समझ कर लोगों में बांटे तो उसकी खुशी कुछ अलग ही होती है।
हम अपना अंत नहीं पा सकते तो संसार का अंत कैसे पा सकते हैं।
जो सच्चा प्यार करता है उसका दिल उसे सच्ची गवाही देता है।
सच्चे नेक दिल वाले इंसान को कभी दुखी ना करें।
उनका दिल सिधा ईश्वर से जुड़ा होता है।
वक्त हर दुःख या चोट की मरहम पट्टी कर देता है वो चाहे अन्द्रुहनी हो चाहे बाहरी।
व्यक्ति चाहे कितना भी दु:ख सहने कि क्षमता रखता हो उसे एक न एक दिन रो के उस दुख को हल्का करना ही पड़ता है।
आत्मा बुद्धि को, बुद्धि दिमाग को और दिमाग मन को वश में कर लेती है अगर हम अपने अंतर आत्मा को जगा ले तो।
हम जीरो हैं तभी तो कोई हिरो है, अगर हम जीरो न होते तो कोई हिरो न कहलाता।
मैं तो सच सच बोलता हूं, दुनिया पागल समझती है।
I think मैं पागल ही हो गया हूं। Sorry दोस्तों अगर किसी के दिल को दुख पहुंचा हो तो आगे से बक बक नहीं करुंगा।
प्यार का सही अर्थ है बिना उसे बताये उसके लिये सब कुछ करना । Simple Word में बिना जताये कि मैं तुमसे प्यार करता हूं, प्यार करना।
ज्ञान से व्यक्ति अपने दुखों को कम कर सकता है।
जरूरत व्यक्ति को जरुरत के हिसाब से ढाल लेती है।
It's True.
इस बह्माण्ड में कुछ भी खत्म नहीं किया जा सकता। यानी कि सिर्फ उसे किसी रुप में ढाला जा सकता है तो बोला गया शब्द कैसे खत्म हो सकता है। इसका मतलब है वो शब्द अनंत तक जायेगी और वापस आयेगी किसी न किसी रुप में।
विवेकानंद जी ने कहा है कि चिंता नहीं चिंतन करो और रोज नये विचारों को जन्म दो। इसके मुताबिक नये विचारों कि कमी नहीं है। जो विचार पसंद आये उसे तुरंत लिख लो।
भगवान के अनुसार विभिन्न कर्म में ही करता हूं और विभिन्न जीवों के रुप में भोगता भी में ही हूँ।
एक Video हमें संकेत देती है कि हमारी Life में घट रही चिजें भी ऐसी Same Video कि तरह ही Play हो रही है।
एक Emotional Movie को देख कर जितना तकलीफ होता है हमें, भगवान को भी उतना ही तकलीफ़ होता होगा मेरे हिसाब से।
इस संसार नामक फिल्म में भी कुछ भी होना संभव है।
जो हमलोग सोच सकते हैं।
इंसान सिर्फ निर्नय ले सकता है नियती के आगे उसका बस नहीं है, इसका मतलब सिधा है जैसा निर्नय लोगे वैसे कार्य करोगे और वैसा ही फल भी मिलेगा। गीता में भी कहा गया है कि इंसान सिर्फ कर्म कर सकता है फल उसके हाथ में नहीं।
बुद्धि के पास दिल नहीं और दिल के पास बुद्धि नहीं इसलिये तो दोनों का Combination चाहिए व्यक्ति में।
ऐसी बातें सोचो जो तुम बनना चाहो अगर सबसे बड़े Level कि बात कि जाये तो, क्योंकि जो आप सोच सकते हैं वो आप बन भी तो सकते हैं।
महात्मा बुद्ध ईश्वर को नहीं मानते थे क्योंकि ईश्वर का मतलब एक प्रकार का मालिक (मुखिया) जो सब का देख-रेख करे। ना कि ऐसा ईश्वर जो सब को अपना नौकर समझे। वैसे भी ईश्वर श्रष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं।
आदमी को सुख-दुख के हिसाब से अपने को ढाल लेना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में संतोष और संयम से कार्य करना चाहिए।
हर परिस्थिति को स्वीकार करना चाहिए और संतोष रखना चाहिए। इससे दुख कम होगा।
ईश्वर न दिखते हुए भी सब जगह मौजुद हैं लेकिन सारा जगत दिखता हुआ भी असल में कुछ नहीं है।
समझदार व्यक्ति हमेशा बुरी चिजों का परीत्याग करते है।
ताकि हमेशा खुश रहें।
हम जो कुछ भी हैं वो हमारे सोच का नतिजा है।
#भगवान_बुद्ध
जो हो रहा है वो होने दो, इसमें हमारा कोई बस नहीं है।अब सवाल उठता है कि हम करें क्या तो इसका उत्तर है जो दिल चाहता है वो करो। अच्छा बुरा मत सोचो, ये सोचना हमारा काम नहीं है हमें व्यर्थ कि चिंता करने की क्या जरूरत। ये ईश्वर समझेगा क्या अच्छा है और क्या बुरा, क्योंकि हम सिर्फ जीव है और हमारा काम है सिर्फ कर्म करना।
सुख-दुख तभी होता है जब हमारे पास ये विवेक आ जाता है कि ये कर्म अच्छा है और ये कर्म बुरा। इसलिए ये अच्छे-बुरे कर्मों का निर्णय ईश्वर पर छोड़ दो और खुल कर अपना जीवन जीयो।
"दिल का Connection सिधा ईश्वर से होता है"
दिल भावनायें वक्त करना जानता है और हर शब्द का भी एक अर्थ होता है। दिल, मस्तिष्क और मन एक दुसरे से जुड़े हैं जब हमें कोई शब्द बोलता है तो हमारा मतिष्क उस शब्द का अर्थ समझ कर दिल के द्वारा उसी तरह कि भावना व्यक्त करता है, जिसको शरीर या हमारा मन समझ जाता है और उसी तरह हम React भी करते हैं। हर वेद ध्वनि चाहे ॐकार हो या कोई गाली ही क्यों न हो, उसका दिल पर उस तरह से ही प्रभाव होता है और दिल उस तरह कि भावना व्यक्त करता है मन या शरीर के माध्यम से। अशब्द (गाली) सुनने पर गुस्सा भी इसी कारण से आता है, दिल को ठेस पहुंचती है और वो वैसे ही भावना व्यक्त कर देता है।
इसका अर्थ ये हुआ कि सच्चे दिल से दिया श्राप, वचन या वरदान सत्य जरुर होता है।
जिस तरह कि भावना से ये श्राप, वचन या वरदान दिया जाता है वैसे ही ये फलित भी होती है और उसकी आगे कि नियती भी ऐसे ही बनती है।
इसलिए जब हम अच्छी बातें (चाहे वो भजन हो, वेद ध्वनि हो या ॐकार हो) सुनते हैं तो हमारा दिल और दिमाग दोनों कि मलीनता दुर हो जाती है जिसके कारण भगवान में मन भी लगता है निश्च्छल भाव से।
दिल को सुख या दु:ख होने पर वह भावनायें व्यक्त करता है जिसे मन मस्तिष्क के माध्यम से उस भाव को समझता है, जो उसे करना होता है।
किसी से किया गया प्रेम कभी नहीं मरता बल्कि उसको जगाने की जरूरत पड़ती है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रेम जागने पर सारी गलत चीजें सही हो जाती हैं।
अब सवाल यह उठता है कि प्रेम अगर मरता नहीं है तो आखिर रहता कहां है तो इसका सीधा सा उत्तर है कि प्रेम हमारे अच्छे पलों में जीवित रहती है, जब हम उन पलों को याद करते हैं तब वह प्रेम फिर से हमारे अंदर जागृत हो उठती है यही शाश्वत है और यह नियम भी है।
हर सुबह इस यकिन के साथ उठो, कि मेरा आज का दिन मेरे कल से बेहतर होगा।
ज्ञान का अर्थ है दुख को कम करना या मुक्ति पाना।
समझ और ज्ञान एक दुसरे के पुरक है।
जिसके पास धन और बल है उसके पास ज्ञान नहीं और जिसके पास ज्ञान है उसके पास धन और बल नहीं। ये सब एक दुसरे के पुरक हैं।
किसी को अपने आप को श्रेष्ट नहीं समझना चाहिए। सबसे बड़ा तो बिल्कुल नहीं।
व्यक्ति का मोह ही सब दुखों का कारण है।
महात्मा बुद्ध के अनुसार
ज्ञान कहीं से भी मिले उसका आदर करना चाहिए और ज्ञान को स्वीकारना चाहिए।
अलग - अलग व्यक्ति के लिए ज्ञान कि समझ अलग हो सकती है। ~ महात्मा बुद्ध के अनुसार
किसी चिज़ का मोह उसे जकड़ लेता है और वह अपने असली लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता।
हर ज्ञान को समझने कि हर इंसान कि अपनी समझ होती है और वह उसके अनुसार उसका प्रसार करता है।
अपने मन पे विजय पाने के लिए खुद पे विजय पाना जरुरी है। जो प्राणायाम और ध्यान से ही संभव है।
किसी ज्ञान को अगर हम अच्छे से समझ कर लोगों में बांटे तो उसकी खुशी कुछ अलग ही होती है।
हम अपना अंत नहीं पा सकते तो संसार का अंत कैसे पा सकते हैं।
जो सच्चा प्यार करता है उसका दिल उसे सच्ची गवाही देता है।
सच्चे नेक दिल वाले इंसान को कभी दुखी ना करें।
उनका दिल सिधा ईश्वर से जुड़ा होता है।
वक्त हर दुःख या चोट की मरहम पट्टी कर देता है वो चाहे अन्द्रुहनी हो चाहे बाहरी।
व्यक्ति चाहे कितना भी दु:ख सहने कि क्षमता रखता हो उसे एक न एक दिन रो के उस दुख को हल्का करना ही पड़ता है।
आत्मा बुद्धि को, बुद्धि दिमाग को और दिमाग मन को वश में कर लेती है अगर हम अपने अंतर आत्मा को जगा ले तो।
हम जीरो हैं तभी तो कोई हिरो है, अगर हम जीरो न होते तो कोई हिरो न कहलाता।
मैं तो सच सच बोलता हूं, दुनिया पागल समझती है।
I think मैं पागल ही हो गया हूं। Sorry दोस्तों अगर किसी के दिल को दुख पहुंचा हो तो आगे से बक बक नहीं करुंगा।
प्यार का सही अर्थ है बिना उसे बताये उसके लिये सब कुछ करना । Simple Word में बिना जताये कि मैं तुमसे प्यार करता हूं, प्यार करना।
ज्ञान से व्यक्ति अपने दुखों को कम कर सकता है।
जरूरत व्यक्ति को जरुरत के हिसाब से ढाल लेती है।
It's True
इस बह्माण्ड में कुछ भी खत्म नहीं किया जा सकता। यानी कि सिर्फ उसे किसी रुप में ढाला जा सकता है तो बोला गया शब्द कैसे खत्म हो सकता है। इसका मतलब है वो शब्द अनंत तक जायेगी और वापस आयेगी किसी न किसी रुप में।
विवेकानंद जी ने कहा है कि चिंता नहीं चिंतन करो और रोज नये विचारों को जन्म दो। इसके मुताबिक नये विचारों कि कमी नहीं है। जो विचार पसंद आये उसे तुरंत लिख लो।
भगवान के अनुसार विभिन्न कर्म में ही करता हूं और विभिन्न जीवों के रुप में भोगता भी में ही हूँ।
एक Video हमें संकेत देती है कि हमारी Life में घट रही चिजें भी ऐसी Same Video कि तरह ही Play हो रही है।
एक Emotional Movie को देख कर जितना तकलीफ होता है हमें, भगवान को भी उतना ही तकलीफ़ होता होगा मेरे हिसाब से।
इस संसार नामक फिल्म में भी कुछ भी होना संभव है।
जो हमलोग सोच सकते हैं।
इंसान सिर्फ निर्नय ले सकता है नियती के आगे उसका बस नहीं है, इसका मतलब सिधा है जैसा निर्नय लोगे वैसे कार्य करोगे और वैसा ही फल भी मिलेगा। गीता में भी कहा गया है कि इंसान सिर्फ कर्म कर सकता है फल उसके हाथ में नहीं।
बुद्धि के पास दिल नहीं और दिल के पास बुद्धि नहीं इसलिये तो दोनों का Combination चाहिए व्यक्ति में।
ऐसी बातें सोचो जो तुम बनना चाहो अगर सबसे बड़े Level कि बात कि जाये तो, क्योंकि जो आप सोच सकते हैं वो आप बन भी तो सकते हैं।
महात्मा बुद्ध ईश्वर को नहीं मानते थे क्योंकि ईश्वर का मतलब एक प्रकार का मालिक (मुखिया) जो सब का देख-रेख करे। ना कि ऐसा ईश्वर जो सब को अपना नौकर समझे। वैसे भी ईश्वर श्रष्टि के कण-कण में व्याप्त हैं।
आदमी को सुख-दुख के हिसाब से अपने को ढाल लेना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में संतोष और संयम से कार्य करना चाहिए।
हर परिस्थिति को स्वीकार करना चाहिए और संतोष रखना चाहिए। इससे दुख कम होगा।
ईश्वर न दिखते हुए भी सब जगह मौजुद हैं लेकिन सारा जगत दिखता हुआ भी असल में कुछ नहीं है।
समझदार व्यक्ति हमेशा बुरी चिजों का परीत्याग करते है।
ताकि हमेशा खुश रहें।
हम जो कुछ भी हैं वो हमारे सोच का नतिजा है।
#भगवान_बुद्ध
जो हो रहा है वो होने दो, इसमें हमारा कोई बस नहीं है।अब सवाल उठता है कि हम करें क्या तो इसका उत्तर है जो दिल चाहता है वो करो। अच्छा बुरा मत सोचो, ये सोचना हमारा काम नहीं है हमें व्यर्थ कि चिंता करने की क्या जरूरत। ये ईश्वर समझेगा क्या अच्छा है और क्या बुरा, क्योंकि हम सिर्फ जीव है और हमारा काम है सिर्फ कर्म करना।
सुख-दुख तभी होता है जब हमारे पास ये विवेक आ जाता है कि ये कर्म अच्छा है और ये कर्म बुरा। इसलिए ये अच्छे-बुरे कर्मों का निर्णय ईश्वर पर छोड़ दो और खुल कर अपना जीवन जीयो।
"दिल का Connection सिधा ईश्वर से होता है"
दिल भावनायें वक्त करना जानता है और हर शब्द का भी एक अर्थ होता है। दिल, मस्तिष्क और मन एक दुसरे से जुड़े हैं जब हमें कोई शब्द बोलता है तो हमारा मतिष्क उस शब्द का अर्थ समझ कर दिल के द्वारा उसी तरह कि भावना व्यक्त करता है, जिसको शरीर या हमारा मन समझ जाता है और उसी तरह हम React भी करते हैं। हर वेद ध्वनि चाहे ॐकार हो या कोई गाली ही क्यों न हो, उसका दिल पर उस तरह से ही प्रभाव होता है और दिल उस तरह कि भावना व्यक्त करता है मन या शरीर के माध्यम से। अशब्द (गाली) सुनने पर गुस्सा भी इसी कारण से आता है, दिल को ठेस पहुंचती है और वो वैसे ही भावना व्यक्त कर देता है।
इसका अर्थ ये हुआ कि सच्चे दिल से दिया श्राप, वचन या वरदान सत्य जरुर होता है।
जिस तरह कि भावना से ये श्राप, वचन या वरदान दिया जाता है वैसे ही ये फलित भी होती है और उसकी आगे कि नियती भी ऐसे ही बनती है।
इसलिए जब हम अच्छी बातें (चाहे वो भजन हो, वेद ध्वनि हो या ॐकार हो) सुनते हैं तो हमारा दिल और दिमाग दोनों कि मलीनता दुर हो जाती है जिसके कारण भगवान में मन भी लगता है निश्च्छल भाव से।
दिल को सुख या दु:ख होने पर वह भावनायें व्यक्त करता है जिसे मन मस्तिष्क के माध्यम से उस भाव को समझता है, जो उसे करना होता है।
किसी से किया गया प्रेम कभी नहीं मरता बल्कि उसको जगाने की जरूरत पड़ती है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि प्रेम जागने पर सारी गलत चीजें सही हो जाती हैं।
अब सवाल यह उठता है कि प्रेम अगर मरता नहीं है तो आखिर रहता कहां है तो इसका सीधा सा उत्तर है कि प्रेम हमारे अच्छे पलों में जीवित रहती है, जब हम उन पलों को याद करते हैं तब वह प्रेम फिर से हमारे अंदर जागृत हो उठती है यही शाश्वत है और यह नियम भी है।
सच्चा प्रेम वो होता है जो आपको आपके प्रियतम (चाहे जो भी हो प्रेमिका, कोई अन्य या फिर ईश्वर।) से आपको मिला दें।
हम कैसे जानेंगे कि हमारा प्रेम सच्चा है, इसका उत्तर है - जब हम निशवार्थ भाव से किसी से प्रेम करने लगें तो उसको हम सच्चा प्रेम कह सकते हैं। जो प्रेम आपको मोह-माया से बांधता हो, वो प्रेम असल में होता ही नहीं है। इसलिए जो निश्छल भाव से ईश्वर को प्रेम करता है उसके लिये सभी रास्ते खुल जाते हैं और वो ईश्वर को पा ही लेता है।
अगर कोई सच्चे दिल से सही राह पर चलता है तो उसको डर इसलिए नहीं लगता है क्योंकि उसके दिल को यह यकीन होता है कि वो सही है। उसे यह क्यों लगता है कि वह सही है और सही राह पर चल रहा है, क्योंकि उसका दिल सच्ची गवाही देता है कि जो वो कर रहा है वह सही है।
सच्ची निष्ठा और लगन से किया गया कार्य विफल नहीं होता चाहे वह जिस क्षेत्र में हो। जिसका कारण उसकी सच्ची निष्ठा है कार्य के प्रति, या फिर लक्ष्य के प्रति।
हमारी आंखें कैमरे (Camera) कि तरह काम करती है, Present में यानि वर्तमान समय में Live देखिए और कुछ देर बाद मन के द्वारा Highlight.
ये व्याख्या सरल होते हुए भी, सरल नहीं जान पड़ती क्योंकि जो कुछ हो रहा है वो आंखें Record करती जा रही है मस्तिष्क में, बाद में यही सब बातें हमें याद आयेंगी और हम इसे Highlights कि तरह देखेंगे।
हर क्षण बितने के साथ वापस नहीं आ रही है।
इसका यह मतलब है कि जो समय बीत गया वो दोबारा वापस नहीं आयेगा।
"ईश्वर ने संसार को परिवर्तनशील बनाया है, क्योंकि ईश्वर खुद नहीं चाहते कि बार - बार उन्हें एक ही दृष्य़ देखना पड़े।"
अर्थात : हमारे जीवन में भी कोई भी चिज़ स्थिर-अपरिवर्तनशील नहीं है, इसका अर्थ है कि कोई भी समस्या हो या दुःख सदा नहीं रहेगी। उसका तोड़ निकलना स्वाभाविक है। इसलिए जीवन में दुःख या समस्या आने पर भी भगवान पर विश्वास रखें और ज्यादा चिंता न करें, हल जरूर निकलेगा।
अगर परिस्थितियां और समय तुम्हारे अनुकूल नहीं चल रही हैं तो तुम धर्य रखो और सही समय का इंतजार करो, यकिन रखो कि तुम्हें भी एक दिन अवसर जरुर मिलेगा।
किसी Movie में 24 या उससे ज्यादा Frame प्रती Second होते हैं। लेकिन हमारी असल Life में कितने Frame होते हैं वो मैं जानना चाहता हूं।
समय नाम कि कोई चिज़ नहीं होती। ये सिर्फ उस पल को याद रखने का नाम होता है। जिससे कि वह पल याद रहे।
जिस मनुष्य के पास सभी प्रश्न भी हैं और उसके सभी उत्तर भी उसके पास तो सब कुछ है और वह चाहे तो अकेला ही प्रसन्न रह सकता है अनन्त तक।
दुनिया में हो रही हर एक चिज़ हमें एक ही तरफ इशारा करती है कि यहां हर जगह सिर्फ हार जीत कि प्रतियोगिता चल रही है और हम इस खेल में प्रतियोगी कि भुमिका निभा रहें हैं। चाहे बात हो छोटे Level कि या फिर बड़े Level कि, सब कुछ खेल सा लगता है।
इस जगत कि हर एक चिज़ कि एक अवधि निर्धारित है, अवधि समाप्त हो जाने पर सब समाप्त हो जायेगा। लेकिन कभी न मिटने वाला अविनाशी ईश्वर सदा रहेगा।
संसार कि माया में नहीं बल्की इसके मुख्य कारण पर ध्यान लगाइये, यानि कि माया का शुन्य जहां से शुरू होता है। तभी दुखों से पार पाया जा सकता है।
जब-जब धरती नामक Storage में पाप नामक Junk Files और पापी नामक Virus पनपेगी, इसे मुक्त करने यानी Clean करने श्रीभगवान इस धरती पर अवतरित होते रहेंगे और जिस तरह Antivirus सभी Virus और Junk Files को सफाया करता है वैसे ही वो अपने सुदर्शन से सब पापों और पाप आत्माओं को खत्म करेंगे।
जैसे कोई पत्ता जन्मता है फिर फैलता है और अंततः मुर्झा के गिर जाता है वैसे ही दुनिया कि सभी जीवों के साथ होता है इसका हमें दुःख नहीं मानना चाहिए। यही संसार कि मोह से निकलने का मार्ग है।
संसार के कण - कण में ईश्वर कि ही सत्ता को जानना और संसार कि हर चिज़ में ईश्वर कि ही माया को देखना ही माया से बचने का तरीका है।
क्या सही है और क्या ग़लत ये सोचने से अच्छा है अपने
जीवन के सत्य को स्वीकारिए जो आपको अपने कर्मों द्वारा
मिल रहें हैं।
साफ पानी के अंदर जिस तरह गंदगी बैठ जाती है। उसी प्रकार हम चाहें तो किसी भी व्यक्ति के अंदर कुछ देर के लिए ही सही लेकिन अच्छाई जगा सकते हैं।
जैसा होगा कर्म वैसा होगा उसका फल। क्योंकि फल जो है वो कर्म करने कि भावना कैसी है यह भी देखता है। इसलिए निराश न हों और अच्छी भावना से कर्म करें आपको फल अच्छा जरुर मिलेगा।।
दुनिया में हर चिज़ का कर्ज चुकाना ही पड़ता है तभी प्रकृति में संतुलन उत्पन्न हो पाता है।
सृष्टि अपने आप थोड़े चलती है इसे चलाने वाला होना चाहिए।
लोग समझते हैं कि मुझ से बड़ा कौन है लेकिन सच्चाई ये है कि सृष्टि में कोई छोटा बड़ा प्राणी नहीं होता।

