सब कुछ ईश्वर कर रहा है उसी का दिया सब कुछ है, और इच्छा भी उसी की होती है। हम सिर्फ सही-गलत चिजों का चुनाव करते हैं। यानी कि जैसा हमारा सही-गलत रास्तों का चुनाव होता है, वह वैसे ही रास्ते हमारे लिये खोलता चला जाता है। हमें सभी चिजों का विवेक मिला है इसलिए हमें सही चिजों का ही चुनाव करना चाहिए।
इस बात को हम इस तरह समझ सकते हैं कि हमारे शरीर में श्वसन प्रणाली अपने आप चल रही है हम ज्यादा कुछ नहीं कर रहें हैं। लेकिन हम इस बात का चयन जरुर कर सकते हैं कि हमें इस पल सांस लेना है या नहीं। अच्छे या बुरे का विकल्प हमारा मस्तिष्क ही हमें देती है। परंतु ये हमारे लिए सही है या नहीं ये हमारा दिल ही सुनिश्चित करता है। दिल का Connection ईश्वर से होता है इसलिए ये सच्ची गवाही देता है।
हमारे पास समझ है और हम चाहे तो अपना जीवन बदल सकते हैं बिना भाग्य को आधार बनाये।
ऐसा नहीं है कि भाग्य का हमारे जीवन में आधार नहीं है बल्की हम चाहें तो भाग्य को भी बदल सकते हैं अपनी कर्मों के जरीए। यहां भाग्य का अर्थ है जीव कि नियती, यानी जैसा उसने अपने कर्मों से फल कमाये हैं। अगर हम चाहें तो अपनी बुद्धि के जरीए अपने कर्मों को अच्छा बना सकते हैं ताकि हमारा नियती यानी भाग्य भी अच्छा हो। हम अपनी बुद्धि को अच्छी जगह लगा दें तो धिरे-धिरे हमारा मन भी वहीं लगने लगता है। और हम अच्छे मन से किसी कार्य को करें तो उसका फल भी अच्छा ही होता है। गलत कार्यों में अगर हम अपना दिल लगायें तो हमारा दिल भी सच्ची गवाही नहीं देता। जिसके फलस्वरूप हम रास्ता भटक जातें हैं और हमें सिर्फ दुःख ही दुःख कि प्राप्ति जीवन में होती है।
मेरे कहने तात्पर्य सिर्फ इतना है जो कुछ हम कर रहे हैं उसका कर्ता हम न हो कर साक्षात ईश्वर है हम बस सही ग़लत का चुनाव कर सकते हैं। सुख और दुःख शरीर के भोग हैं जो वो अपने कर्मों के द्वारा प्राप्त करती है। हम आत्मा हैं और हमारा लक्ष्य मौक्ष प्राप्त करना होता है न कि कर्मों के द्वारा प्राप्त किये सुख-दुःख।
दोस्तों ये मेरी छोटी सी कोशिश थी जीवन को बेहतर बनाने कि अगर आपको मेरा ये लेख अच्छा लगा हो तो इसे Share करना न भूलें...धन्यवाद ।
मेरे कहने तात्पर्य सिर्फ इतना है जो कुछ हम कर रहे हैं उसका कर्ता हम न हो कर साक्षात ईश्वर है हम बस सही ग़लत का चुनाव कर सकते हैं। सुख और दुःख शरीर के भोग हैं जो वो अपने कर्मों के द्वारा प्राप्त करती है। हम आत्मा हैं और हमारा लक्ष्य मौक्ष प्राप्त करना होता है न कि कर्मों के द्वारा प्राप्त किये सुख-दुःख।
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