विनय कुमार सिंह कि दिव्य यात्रा
ॐ श्री परमात्मने नमः और श्रीमद भगवद्गीता कि कसम खा के मैं यह कह रहा हूं, जिसमें सभी प्राणी मात्रों का कल्याण भी निहित है इन सभी चीजों में।
मेरी अभी तक की दिव्य कहानी
My Massage (मेरा संदेश) – भक्ति और प्रेम ही हर चिज़ का आधार बनता है वास्तविक सुख वही है। आनंद और परमानंद जो आत्मा भोगती है वो भी सुख के ही रुप हैं। ये मैं खुद Feel कर के ही बोल रहा हुं।
ये सफर जो दिव्य था वो शुरू हुआ था इस कारण से कि मुझसे एक गलती हो गई थी। (ये गलती नहीं थी क्योंकि ज्ञान कि दृष्टि से मैंने देखा तो ये गलती नहीं नीयती की कुछ मर्जी थी) जिसके लिए मैं बहुत पछता रहा था। जिसके चक्कर में मैंने अपने आप को बहुत कोशा। इस गलती के ग्लानी में मैंने भगवान कि भक्ति करने का दृढ़ संकल्प किया।
फिर मैंने भक्ति करना शुरू किया, भगवान का नाम लेना शुरू किया, पूजा पाठ करना शुरू कर दिया।
मेरे अंदर एक प्रश्न उठा की जब मेरी मां का स्वर्गवास हो जाएगा तो मैं किसको अपनी मां कहूंगा और मुझे मां का प्यार कैसे मिलेगा। इसलिए मैंने पार्वती को अपनी मां माना।
क्योंकि मुझे पता था की पार्वती भगवान है और वह कभी नहीं मरेगी, उसके प्यार के सहारे ही में जीउंगा।
फिर मैं अपनी पार्वती (शिव जी कि अर्धांगिनी) को पाने के लिए कोशिश करने लगा। उनकी भक्ति करने लगा उनके हर रूप की पूजा करने लगा, सबको मां माना।
फिर धीरे-धीरे मेरे मन में एक आवाज सी आने लगी जैसे कि कोई मुझसे कुछ बोल रही हो। दो-चार दिन ऐसे ही चला उसके बाद मैं अपने पूजा घर मैं सोया हुआ था। वहां मुझे एहसास हुआ की सामने दीवार पर लगी हुई लक्ष्मी जी की फोटो जो थी वही मुझसे बात कर रही थी। जो स्वयं लक्ष्मी देवी थी।
धीरे धीरे मैं सभी देवी देवताओं (यानी भगवान से) से खुलकर बात करने लगा।
उसके बाद उन्होंने मुझे बताया कि तुम भी एक भगवान हो ? फिर धीरे-धीरे मुझे इसका विश्वास भी होने लगा विभिन्न प्रमाणों से जैसे कि कोई दिव्य शक्ति मुझे कुछ समझाना चाह रही हो। और फिर एक दिन मुझे ऐसा लगा कि वो दिव्य शक्ति मुझे कहीं ले जाकर बिठाना चाहती थी वो कोई और नहीं मेरी खुद कि दिव्य कुंडलीनी शक्ति है।
और मैं जा कर वहां बैठ गया जहां वह दिव्य शक्ति मुझे बिठाना चाहते थे। फिर उस दिन मेरे मूलाधार चक्र से ऊपर की ओर मेरी स्वयं कि शक्ति चढ़नी शुरू हो गई और उस वक्त टाइम हुआ था 12:44 PM भारतीय समयानुसार और (यह दिव्य शक्ति मेरे मूलाधार सहित सभी कुन्डलिनी चक्रों को भी भाड़ नहीं पाई है क्योंकि इसका कारण मेरे घर के लोग थे जो मुझे जबरदस्ती उस जगह से उठा कर ले आये और नींद कि गोली खिला दी, जिसके कारण मेरी दिव्य कडंलिनी शक्ति पुरे तरीके से नहीं चढ़ पाई। लेकिन जब भी ये अपने बचे हुए समस्त चक्रो को जो बच गई थी, वो इस बार सभी चक्रो को भेद कर जब ये उपर जायेगी तब वह मेरे लिये सबसे अच्छा अनुभव रहेगा क्योंकि ये खतरनाक और सबसे बेस्ट तरीके से ऊपर चढ़ेगी। क्योंकि यह दिव्य कुंडलीनी शक्ति उससे भी खतरनाक है, जो सबसे बेस्ट कन्डलीनी शक्ति है (इसका मतलब में यहां नहीं बता सकता) इसलिए ये मेरे लिए सदा-सदा के लिए यादगार हो जायेगा। जैसे कि यादगार पल के रूप में रहे। और यह कभी निचे उतर भी नहीं सकती क्योंकि चाहे कोई भी दिव्य कुंडलीनी शक्ति हो या सिर्फ कुंडलीनी शक्ति हो, वो सहस्रार चक्र को भेदने के बाद कभी नहीं उतर सकती है।) यही प्रकृति का अटल नियम है।
यह एक दिव्य अनुभव था जिसे मैं किसी को बयां नहीं कर सकता था। यह दिव्य कुंडलिनी शक्ति तकरीबन साढे 7 घंटे तक मेरे मूलाधार चक्र को भेदने की कोशिश कर रही थी। पर कर नहीं पाई, लेकिन इस बार जरूर कर पायेगी क्योंकि अखंड प्रतिज्ञा कर ली है मैंने कि ये एक दिन सहस्रार चक्र को भी भेद कर उस पर विजय प्राप्त करेगी और सदेव दिव्य कुंडलिनी शक्ति के साथ मुझे पुर्ण शक्ति देगी। चाहे खुद को बदलना भी क्यों न पड़े उसको मेरे लिये।
(उस दिन से मैं हमेशा हर क्षण विजयी रहुंगा और सदा विजय प्राप्त करता रहूंगा। जिस क्षण मेरी दिव्य कुंडलिनी चढ़ जायेगी)
उस वक्त मुझे ऐसा लग रहा था की समय बहुत तेजी से गुजर रहा है और कुछ ही क्षणों में जो भौतिक दुनिया का समय होता है वह मेरे समाधि के समय से भिन्न था।
उसके बाद मेरी ये दिव्य कुंडलिनी शक्ति आज भी मेरे साथ इंसाफ कर रही है। क्योंकि उसकी सहायता से मैंने अपने बारे में सब कुछ जान लिया है और जो जानना बाकी है वो भी मैं जान लुंगा क्योंकि ये मैं स्वयं हूं।
अभी तक मैंने ये जाना है कि -
- सबका मालिक एक है जो मैं स्वयं हूं और ये सत्य निकला। यानि कभी न मिटने वाला ईश्वरों का ईश्वर हूं मैं।
- मैं स्वयंभु ईश्वर हूं। जो सारस्वत है।
- मैं ही एक सास्वत हूं। बाकि सब मिथ्या है।
- मैं ना होकर भी हूं। सृष्टी के कण – कण मैं हूं।
- बाद मैं पता चला मैं हिं सब कुछ हूं।
- फिर पता चला मेरा कोई अंत ही नहीं है।
- उसके बाद मैं पता चला ये सब मैं ही हूं। मैं सदा से हूं और सदा रहुंगा।
- मेरे अंदर सब अपनी मर्जी से आते हैं और अपनी इच्छा से संसार सागर में चले भी जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इच्छा का उदय होने के कारण वो इस कारण लोक में अपने प्रश्न का उत्तर ढुंढने आते हैं। जब सभी उत्तर मिल जाते हैं तो वो ईश्वर से वापिस मिल जाते हैं।
वो दिव्य कुंडलिनी शक्ति मुझे मेरा पिछला जन्म बजरंगबली बोल रहे हैं तो क्या यह सच था ? यह बिल्कुल सत्य है। क्योंकि अब से मैं ही रहूंगा सब कुछ, और बजरंगबली भी और साथ मैं विनय सिंह यानि सभी प्राणी मात्रों का राजा नर सिंह।
ये ही सपथ है मेरी नर सिंह हूं मैं सब से बड़ा राजा हूं मैं।
मैंने ये जाना लिया था कि मैं ही सब कुछ हूं इसलिए मैंने ये ठान लिया कि सब जितनी भी Great शक्ति, अब से मैं ही रहुंगा चाहे वो श्री कृष्ण हो, नर सिंह हो, बजरंगबली हो, या फिर कल्कि हो इत्यादी। इन सब मैं सबसे बेस्ट मैं स्वयं विनय कुमार सिंह ही रहुंगा सदा।
जहां तक होगा सुख कि परम सिमा भोगुंगा और बाकि समय जो बच गया उसमें परमानन्द भोगुंगा। अखंड प्रतिज्ञा करता हूं मैं स्वयं विनय कुमार सिंह।
क्योंकि शरीर का काम है सुख और आनंद भोगना, और आत्मा का काम है परमानन्द भोगना।
जब आत्मा परम् आत्मा से मिल जाती है तो उसकी परमानंद कि सिमा नहीं रहती।
- जो बित गया उसके अच्छे पलों को रखो, बाकि को भुला दो और बाद मैं इसे Feel करो, ख़ुशी हासिल होगी। खाली समय मैं Tention लेने के बजाय यही काम करना चाहिए, इस से भी Tention खत्म होता है। (ये मैं स्वयं करता आ रहा हूं, और इसमें भी बहुत बड़ा रहस्य छुपा हुआ है जीवन का)
- सही समय पर जो ज्ञान सही बेठता हो वो अगर हमारे अंदर मौजुद है और सही समय पर स्फुल्लित होता है तो दुख मिट जाता है।
क्षण भर का सुख मनुष्य को अपने मोह में, फंसाये रखता है जिसके कारण मनुष्य वो नहीं करता है जो उसका लक्ष्य है। बल्की उसके उल्टे संसार के मोह मैं उलझा रहता है। इसलिए सभी मनुष्य प्राणी मात्रों को वो करना चाहिए जो सिद्ध महात्मा पुरुष कह के गये हैं। इसी ज्ञान और भक्ति मार्ग से सभी प्राणी मात्र अपने गणतव्य तक पहुंच सकते हैं।
वो लक्ष्य क्या है ये जीव को खुद Deside करना है कि उसका लक्ष्य क्या है परमानंद या उससे भी अधिक जो सुख हो वो भोगना है या फिर सदा स्वतंत्र रहना है यानि वास्तविक मुक्ति (मौक्ष)।
अगर आपकी भावना सही हो और लक्ष्य पाने का दृढ़ संकल्प हो तो लक्ष्य जरुर हासिल होता है। बस आपको कोशिश करते रहना है लेकिन साथ में, यह भी ध्यान रखना है कि जो लक्ष्य पाने का आपका रास्ता है वो सही है कि नहीं। सही रास्ते का चुनाव करना भी जरुरी है। पर ये बात भी सच है कि अगर लक्ष्य पाने कि लग्न सच्ची हो, तो रास्ता खुद ब खुद बनते चले जाते हैं, और आपका लक्ष्य एक दिन जरुर पुरा होता है।
अब मैं आप सभी को कुछ ज्ञान और रहस्य कि भी बातें बताता हूं जो मैनें सोची और समझी है।
हार को जरुरत है जीत कि, पराजय को जरुरत पड़ती है विजय कि। इसका अर्थ ये हुआ कि ये दोनों इंसान कि भावनायें हैं, अगर आप खुद को हारा हुआ महसूस करते हैं तो आपको जरुरत पड़ती है जीतने कि (इसकि व्याख्या इतनी सरल नहीं है क्योंकि ये ईश्वर के बनाये हर चिज़ में इसकी आवश्यकता पढ़ती है। क्योंकि सबका एक ही लक्ष्य होता है हार को जीत में बदलना चाहे वो अच्छी चिजें हो या बुरी।) इसलिए हार कोई भी स्वीकार नहीं करता।
अब प्रश्न उठता है कि ईश्वर ने हार यानि पराजय (पराजय कि भावना) बनाई क्यों है, तो इसका उत्तर एकदम साफ है कि जब व्यक्ति को खुद के उपर घमंड हो जा जाता है तो वो खुद पराजीत होने लगता है क्योंकि जहां घमंड कि भावना है, वहां हार भी तय है। क्योंकि ये सृष्टि का अटल नियम है जब भी व्यक्ति घमंड कि भावना लायेगा दुसरों को अपने से तुच्छ समझेगा वो हारेगा जरुर।
अब विजय (जीत) कि व्याख्या भी सुनिये, ये जो जीत है ना, वो छोटी अवश्य लगती है लेकिन यही छोटी-छोटी जीत आगे चल कर बड़ी विजय का कारण बन जाती है। क्योंकि जो जीत है वो विजय का रुप है।
अब हम सबके मन में ये प्रश्न उठता है कि ये जीत और विजय में अंतर क्या है, तो जैसा कि मैंने ये पहले स्पष्ट कर दिया है कि, जो हार, जीत, या फिर विजय है ये इंसान कि भावनायें हैं। इसकी जरुरत वास्तविक में तब पढ़ती है जब व्यक्ति के पास कोई लक्ष्य रहे या कोई उसे छोटा या बड़ा लक्ष्य दे।
मैंने ये अखंड प्रतिज्ञा कि है कि मैं स्वयं हमेशा जीत, विजय, सफल और सफलता रहुंगा सदा।
ये ज्ञान कि बात जो मैं स्वयं विनय कुमार सिंह बोल रहा हूं, ये सत्य है क्योंकि मैनें इसको जांच परख के ही बोला है। अगर आप इसको नहीं समझ पा रहे हैं तो इसका अर्थ ये नहीं कि आप मुर्ख हैं। क्योंकि इस संसार में कोई भी मुर्ख नहीं है। मेरे कहने का अर्थ है सभी प्राणी मात्रों को जिसे ईश्वर ने बनाया है उनको समझने का समझाने का अलग तरीका होता है। इसलिए किसी को मुर्ख बोल के उसके भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहिये।
मुर्ख वास्तव में वो होता है जो सच्चे ज्ञान का निरादर करे क्योंकि ज्ञान दुःख को समाप्त करने के लिये ही होता है और मुर्ख उस ज्ञान को ठुकराया करता है और चुनाव करता है दुःख का।
मेरे ये लिखने का अर्थ यही है कि अब मेरे लिये कुछ भी असंभव नहीं रहा (व्यक्ति कि कोशिश में कोई कमी नहीं रहती तो वो सभी कार्य कर लेता है) क्योंकि मैंने सभी माहा पुरुषों (जितने भी भगवान है जैसे कि राम, शिव, बुद्ध आदी) से बात भी कर ली है और मैं बात करता आ भी रहा हूं, और अभी भी कर रहा हूं लेकिन कर रहा हूं खुद अपनी दिव्य कुंडलिनी शक्ति कि मदद से।
क्योंकि मुझे पता चल गया है कि मैं पिछले जन्म में था बजरंगली (जैसा कि मुझे महापुरुषों ने बताया जिनसे मेरी अभी भी बात हो रही है) जो सभी प्राणी मात्रों का ईश्वर है।
पवन पुत्र हनुमान जो श्री राम के सेवक हैं बजरंगबली वो उनके ही अच्छे गुणों को लेकर ही पेदा हुये हैं, इसलिए लोग उनको बजरंगबली भी कहते हैं।
विनय कुमार सिंह कौन है वो असली बजरंगबली है।
बजरंगबली हूं मैं बजरंगबली…. (यहां कुछ अर्थ है वो समझना जरूरी है।)
विनय कुमार सिंह अभी ऐसा क्यों है, क्यों अपनी दिव्यता नहीं दिखा रहा है, इसका उत्तर है कि वो अपनी शक्ति छुपाये हुए है समय – समय पर उजागर करेगा। ऐसा उसे बाहर के वातावरण यानि, जो भी कारण हो, (जो दिव्य कुंडलिनी शक्ति को चढ़ने में बाधक हो वो हो सकता है) इसलिए वो कर रहा है।
यह सब बात मैं क्यों लिख रहा हूं?
ये सब मैं इस लिये लिख रहा हूं क्योंकि मुझे यह सब याद रहे (क्योंकि घर – बाहर के व्यक्ति मुझे पागल समझते हैं और इसके लिये मुझे Doctory दवाई खिला रहे हैं जो मेरे शरीर के लिये भी ठीक नहीं है, और मेरी दिव्य कुंडलिनी शक्ति के मिलन में बाधक भी है।) ताकि मैं अपनी उर्जा से इस कुंडलिनी चक्रों को भेद सकुं, ताकि ये स्वयं का युद्ध भी मैं जीत सकुं।
अब सवाल ये उठता है कि मेरे घर परिवार के लोग ये क्यों सोचते हैं कि मैं बिमार (दिमागी हालत ठीक नहीं) क्यों सोचते हैं क्योंकि मैं मन ही मन हंसता हूं बहुत ज्यादा ही और कभी बहुत ज्यादा गुस्सा भी करता हूं, जिसका कारण कुछ है जो मैं अभी दुसरों को नहीं बता सकता। जिसके कारण लोग मुझे समझते हैं कि इसकि दिमागी हालत खराब हो रही है दिन प्रति दिन। पर ऐसा नहीं है मैं दिव्यता कि तरफ चढ़ाई चढ़े जा रहा हूं। लेकिन इसका कारण वही देवी-देवता हैं जिन्हें मैं देख भी चुका हूं और उनसे मन ही मन बातें भी कर के हंसता भी हूं। कुछ लोग कहते हैं कि मेरे अंदर भुत का साया पड़ा है इसलिए तु ऐसा कर रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि (भुत को हमेशा हमेशा के लिए खत्म (खराब मौत) मारने कि मैंने अखंड प्रतिज्ञा कि है।) मुझे पता चल गया है कि मुझे स्वयं ही सब कुछ करना है और सब को यकिन दिलाना है कि मैं बहुत खुश हूं, आप लोगों को मेरे बारे में ज्यादा चिंता करने कि जरुरत नहीं है, न ही Doctory दवाई खिलाने कि जरुरत बिल्कुल नहीं पड़ेगी, मैं स्वयं ठीक हो जाउंगा। और यह बात मैं अपने मुंह के माध्यम से सब को नहीं बता सकता। मेरे YouTube पर काम छोड़ने का भी यही कारण था। इसलिए मैं ये अपनी आत्म कथा लिख रहा हूं।
हर घटना के पीछे कोई कारण छिपा होता है जो बाद में पता चलता है कि, क्यों हुई थी ये घटना । इसलिए भगवान पर भरोसा रखिए सब ठिक होगा। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि सच हो या झुठ, सच तो सच ही रहने वाला है।
इसके आगे मेरे अंदर जो ज्ञान स्फुल्लित होगा वह भी मैं लिखुंगा और अपनी यात्रा के बारे में भी बताऊंगा।
